Siya goddess poem
सिय मेरे सम्मुख बैठी थी
असुअन से नैनन मिचीं थी
ये कैसा कलंक है पाया
निंदक को मिली जो छाया
मैं दुर्बल सबल कब बनी थी
सिय तब मेरे सम्मुख बैठी थी
डोर बंधे थे जो मन की साँसे
तोड़ तोड़ मोहे एक बार न ताकें
जा सिय फिर भी श्री राम कहेगी
राह पर बैठी तेरी राह तकेगी।
By sujata mishra
#siya #poem #song #geet #sujata #mishra #sriram #gana #bhajan #god
असुअन से नैनन मिचीं थी
ये कैसा कलंक है पाया
निंदक को मिली जो छाया
मैं दुर्बल सबल कब बनी थी
सिय तब मेरे सम्मुख बैठी थी
डोर बंधे थे जो मन की साँसे
तोड़ तोड़ मोहे एक बार न ताकें
जा सिय फिर भी श्री राम कहेगी
राह पर बैठी तेरी राह तकेगी।
By sujata mishra
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