Self respect poem with moral

एक बार एक छोटा सा पौधा उगा। चारों तरफ की हरियाली देख मुस्काया।
किसी ने कहा कि देख मैं कितना बड़ा तो किसी ने अपनी मजबूती को दर्शाया।
किसी ने फूलों तो किसी ने फलों को दिखलाया।
कोई सुंदरता तो कोई खुद की हरियाली पर इतराया।
वह नन्हा छोटा सा पौधा खुद को न समझ पाया।
अंदर ही अंदर मन में वो घबराया।
हर कोई उससे उसकी पहचान चाहता।
हर ओर से उसे जो देखे नकारता।
पूछते क्यूँ और कौन तू अपनी शान तो दिखा।
क्यों बन रहा है बोझ तू अपनी मान तो दिखा।
हारना कभी न मन में जो उसने ठाना।
तोड़ता जड़ों को खुद ही दौड़ता चला वो।
राह में जो मिली नदियाँ पार करता गया वो।
कभी बना कवक तो कभी बना मछलियां।
कभी बना मगर तो कभी बना तलैया।
निकला वहां से मरु थार जा वो पहुँचा।
ऊंटों की शक्ल धरता पृथ्वी पर यूँही रहता।
मरु थार जो न भाया गगन चुम्बी पर्वतों पर
जा डाला वो बसेरा बन बैठा एक सपेरा।
कुछ भी न मन से समझा बस जीता रहा रहा मरता।
रूपों को वो बदलता धूपों को वो सिहरता।
मन मंजरी बना था छाँव में वो खिला था।
जीवन के क्रम को जीता।
रूपों और धूपों को लेता।
मृत्यु दंश में फिर जकड़ा।
धूलि में फिर से लिपटा।
खुद को न फिर भी समझा।
क्यूँ मरता और मैं जीता।
धूल ने फिर उसे समेटा।
नई कोपलों सा फूटा।
तब खुद को वह समझा।
दुबारा जो वो फिर जन्मा।
नन्हा सा फिर से पौधा।
वजूद को अपने समझा।
जीवन सजीव करता।

संजीवनी ही हूँ मैं।
सजीव तुम्हे मैं करता।

By sujata mishra
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