Poem on ishwar /God

मेरी बात न सुन न सुन कभी
कभी दूजों की तो सुना कर।
वो भी हर कदम मेरी ही बस
दुआ सरेआम सरेराह करते है
तू तो ईश्वर है नश्वर है सस्वर है
क्यूँ अपनी आवाज को दूजों में
दूजों से छिपाता है, मिलाता है।
मन में उनके जो खनक है वो
किसने और कब दी तुझे ही पता
जाग कर रातें और रातों को सुबह
बना देना भी तेरी ही कड़ी थी।
बिगड़ती है बिगड़ जाए किसी की
तकदीर तो क्या, सँवारने के लिए
भी तो तुझे जमीं पर आना ही होगा।
तो क्यों न खुद से तकदीर बिगाड़ू
कभी खुद बिगड़ू या कभी तुझको
इतना बिगाडू की सामने हो तुम और
मैं शायद तुम्हे न पहचानूं ।
To be continued
By sujata mishra
#poem #ishwar

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