Book of god poem

कितने रंगों से जिंदगी बनी
कितने संगों से ये सजी संवरी।
धूप न छाँव की दरख़्त मिलती
फूल न पात की खुश्बू फैलती।
कुछ गिने चुने से लोग मिलते
बाकियों की खुद की कश्ती।
न पूछेंगे कभी अपनी खुशियों में
खुद के गमों में आएंगे गले लगने।
ऐ जिंदगी उन्हें भी समझा इस तरह
जिस तरह खुली किताब कहती है।
खुद के सारे पन्नो को समेटे रहती है
जो अलग हुए वो सब वजूद खोती है।
हर जिंदगी की किताब को संभालो
हर पन्ने की तकदीर को सुधारों।
हे ईश्वर। हर किताब तुम्हारी है
हर अक्षर हर जिंदगी का हर शब्द
तुम और तुम्हारी ही निशानी है।
By sujata mishra
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