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संग समर्पण सम्मान स्नेह शुभाशीष
देख रास्ता खोलती मधुर व्यवहार से
हर लोक में श्रेष्ठ है वह वही जो सिर्फ
लड़ता हर युद्ध मृत्यु जीवन मृदुवार से
कलरव करती यूँही रोज पक्षी दिनरात
सूर्यतप्त है जो खड़ा हरपल बना प्रमाण
नदियां झरने सूखते न कर सके प्रतिकार
उस मनुष्य का जिसने छीन ली मुस्कान
खुद के लिए प्रकृति का किया सर्वनाश
देख रंग बिखेरता लेकर तुम्ही से ये कौन
सुन ध्वनि को है ये बजाता लेके तुम्ही से
बोलता है मृदु भाष किसका? तुमसे ही
सजग नही हम संग नही हम न समर्पण
स्नेह सम्मान शुभाशीष न कुछ मोल इनका
पृथ्वी काँपती उठा सिर बोलेगी इक दिन
बदलेगी ऊर्जा को ऊर्जा से तेरी और मेरी।
By sujata mishra
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